जब विकास दिखता ज़्यादा है, होता कम है!



मान लीजिए आज मेरी सैलरी 50 हज़ार है और अगले महीने 1 लाख हो जाती है — तो यह तरक्की है।

लेकिन अगर अगले 10 साल बाद भी मेरी सैलरी 1 लाख ही होती है, तो यह तरक्की नहीं है, यह सिर्फ़ inflationary growth है, जो हर चीज़ में अपने-आप लागू हो जाती है।

आज हमारा देश अर्थव्यवस्था, उत्पादन और सेवा उद्योग में जिस स्तर पर है, वहाँ तक पहुँचने में दशकों लगे हैं। यह एक ऐसा stage है जो दिखने में भले ही बड़ा लगे, लेकिन इसकी गति बहुत धीमी रही है। अगर हम अपने संसाधनों — जैसे tourism, manpower और बाकी सभी क्षेत्रों — को asset value बनाकर, हर social और contemporary factor को ध्यान में रखते हुए सही निर्णय लेते, तो आज हम कहीं और खड़े होते।

आज जिन देशों को हम अपने से आगे देखते हैं, वे कभी न कभी उसी जगह पर थे जहाँ आज हम हैं। Foreign countries हमसे आगे हैं — इसका कोई एक कारण नहीं है, बल्कि कारणों का पूरा set है।

हमारे देश में stability ज़्यादातर slow growth में रही है। जो growth हमें rapid दिखाई जाती है, वह असल में rapid नहीं है। वह हमें इसलिए तेज़ लगती है क्योंकि दुनिया काफ़ी speed से आगे बढ़ रही है, और हम तुलना में थोड़ा तेज़ महसूस कर रहे हैं।
देश के हालात ऐसे क्यों हैं और ऐसे क्यों रहे — इसके पीछे कई कारण हैं।

मान लीजिए मैंने कोई गलती की और consequences के बाद उसे सुधारा। तो यह पूरी संभावना है कि वही गलती मुझसे दोबारा भी हो सकती है।

सब कुछ हमारे सामने है, फिर भी हम न ठीक से देख रहे हैं, न सोच रहे हैं। हम बस यही सोचते रहते हैं कि हमारे पास क्या है और हम कर ही क्या सकते हैं। हम मान लेते हैं कि एक अकेले इंसान के बोलने, या दो-चार लोगों के चिल्लाने से क्या होगा।

ज़रूरत इस बात की है कि हम यह सोचना छोड़ें कि हम क्या नहीं कर सकते, और यह समझें कि अगर हम चाहें तो सब कुछ संभव है।
आज कम से कम हम इतने मजबूत तो हो चुके हैं कि Emergency जैसी कोई चीज़ दोबारा थोपना आसान नहीं है।

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