कब तक...?
हाल ही में देश में एक के बाद एक रेप की घटनाएँ सामने आई हैं। सवाल यह है — इनका जिम्मेदार कौन है?
और सबसे बड़ा सवाल — ये सब हमारे समाज में कब तक चलता रहेगा?
अब तो हालात ऐसे हो गए हैं कि अखबार में अगर कोई रेप की खबर दिख जाए तो हम बिना पढ़े ही पन्ना पलट देते हैं।
क्योंकि अब हम थक चुके हैं — पढ़ते-पढ़ते, सुनते-सुनते, देख-देखकर।
लेकिन फिर वही सवाल हमारे ज़ेहन में गूंजता है,
एक शोर की तरह बाहर निकलता है —
"आखिर ये सब कब तक चलेगा? कब तक?"
हर बार एक ही सवाल... और एक ही जवाब
मैं हमेशा एक ही सवाल करता हूँ और एक ही जवाब देता हूँ:
सवाल:
क्या इस बार भी हमें सिर्फ "न्याय का भरोसा" दिया जाएगा?
और जब तक किसी और बहन के साथ वही हादसा न हो जाए,
तब तक यह केस अदालतों में यूँ ही पड़ा रहेगा?
इन दरिंदों के हौसले आखिर कब तक बुलंद होते रहेंगे?
क्या हम सब, हमारे समाज, हमारी सुरक्षा व्यवस्था और हमारी मानसिकता भी इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं?
क्या किसी लड़की के साथ बलात्कार होने के बाद,
उसका आत्मदाह कर लेना केवल उसका फैसला होता है,
या हमारे संकीर्ण और कठोर समाज की मानसिकता की देन है?
यह वही देश है जहाँ लड़कियों को देवी स्वरूप माना जाता है,
फिर क्यों उन्हीं संस्कारों का गला घोंटा जाता है?
दूसरे देशों में कानून सख्त हैं…
चीन में बलात्कारी को तत्काल मृत्युदंड दिया जाता है।
उत्तर कोरिया में अपराधी को सार्वजनिक रूप से गोली मार दी जाती है।
यूएई (संयुक्त अरब अमीरात) में सात दिनों के भीतर फाँसी दी जाती है।
सऊदी अरब में बलात्कारी का सिर कलम कर दिया जाता है और यौनांग भी काटे जाते हैं।
इराक में दोषी को 7 दिनों के अंदर मौत की सजा दे दी जाती है।
लेकिन भारत में?
जहाँ महिलाओं को सम्मान का प्रतीक माना जाता है —
वहीं हर महीने सैकड़ों बलात्कार के केस दर्ज होते हैं।
पर इनमें से कितनों को न्याय मिल पाता है?
मेरे कुछ सवाल सरकार से...
माननीय भारत सरकार,
मैं एक जागरूक और युवा नागरिक हूँ, और इस देश के संविधान का सम्मान करता हूँ।
आपने ट्रैफिक कानून सख्त किए — लोग हेलमेट पहनने लगे।
नोटबंदी से अरबों रुपए का काला धन सामने आया।
जम्मू-कश्मीर को पुनः भारत का अभिन्न हिस्सा बनाया।
तीन तलाक पर कड़ा फैसला लिया।
तो फिर...
कब तक किसी की बहन, बेटी, पत्नी, भतीजी दरिंदों का शिकार बनती रहेगी?
ये दरिंदे हमारे ही आसपास होते हैं —
माहौल का फायदा उठाकर छेड़खानी और बलात्कार जैसे अपराध करते हैं।
लेकिन दोष सिर्फ माहौल का नहीं —
सबसे बड़ा दोष हमारी मानसिकता का है।
हम सब ज़िम्मेदार हैं…
क्या हम ट्रेन, बस, बाजार में महिलाओं के साथ हो रही बदसलूकी पर आँखें मूंदे रहते हैं?
क्या कपल्स को पीटने, और लड़कियों को शर्मिंदा करने के वीडियो वायरल कर हम उस मानसिकता को बढ़ावा नहीं दे रहे?
हमारा समाज अब इस हद तक असंवेदनशील हो गया है कि ये घटनाएँ "नॉर्मल" लगने लगी हैं।
हकीकत और विरोधाभास
सरकार महिला सशक्तिकरण की योजनाएं चला रही है — जो जरूरी भी हैं।
लेकिन सोचिए, जब कोई लड़की 7 किमी दूर कोचिंग जाती है,
तो उसके सुरक्षित लौटने की कोई गारंटी नहीं होती।
ये वही भारत है जिसने चाँद पर झंडा गाड़ा,
ये वही देश है जहां कल्पना चावला अंतरिक्ष में गई,
ये वही देश है जहां लक्ष्मीबाई ने दुश्मनों से अकेले लोहा लिया।
फिर आज...
भारत में ही आशिफा, ट्विंकल, डॉक्टर, निर्भया जैसे अनगिनत नाम क्यों बनते जा रहे हैं?
अब बस! अब और नहीं!
अब हालात बदलने होंगे — चाहे जैसे भी हों।
सरकार अपना काम कर रही है, लेकिन
हमें सिर्फ प्रदर्शन नहीं, सहयोग और समाधान के साथ आना होगा।
हमें करना क्या है?
1. अपने समाज में महिलाओं के प्रति अपने कर्तव्यों को पहचानना।
2. हर लड़के को सिखाना कि बाहर दिखने वाली कोई भी अकेली लड़की उसकी "जिम्मेदारी" है, न कि "मौका"।
ये हमेशा संभव नहीं होगा, लेकिन सोच बदलनी जरूरी है।
3. लड़कियों को आत्मरक्षा की ट्रेनिंग देना, उन्हें स्मार्ट और नॉलेजेबल बनाना।
4. बचपन से लड़कों-लड़कियों में फर्क खत्म करना, और "गुड टच-बैड टच" की शिक्षा देना।
5. सरकार की लापरवाहियों पर विरोध जरूर करें, लेकिन उनके साथ मिलकर सामाजिक बदलाव लाएं।
अंत में...
हर बार जब मानवता को शर्मसार करने वाली घटना होती है,
हम चीखते हैं, मोमबत्तियाँ जलाते हैं, पोस्ट डालते हैं।
लेकिन इससे पहले कि एक केस खत्म हो,
दूसरी ब्रेकिंग न्यूज़ आ जाती है।
अब वक़्त आ गया है —
कड़े एक्शन का,
सोच में बदलाव का,
और ज़िम्मेदारी निभाने का।
सरकार करे या न करे —
हमें करना होगा।
हर लड़की की सुरक्षा —
हम सबका कर्तव्य है।